रविवार, 12 जुलाई 2020




 इस दुनिया की सच्चाई को बदल रहा इंसान हैं,
मदद ना करना तुम किसी का अब मिल रहा यही संस्कार है।
कागज कलम दवात नाम  के ही अब सामान है,
चंद रुपयों के खातिर यहां बिकता जिनका ईमान है।
प्रेम सद्भावना अब रही ना इनमें,
हीन भावना और मतलब से सजा यहां बाजार है।
खुद में कभी ना बदलाव है लाता  मगर बदलना चाहता है समाज को,
 किस घमंड में चूर है दुनिया 1 दिन मरना है इंसान को,
 कागज के टुकड़ों को बना लिया है देवता बेंच रहा है खुद के ईमान को।
 समझ जाओ ऐ दुनिया वालों दया सब के प्रति दिखलाओ,
  बचा है मौका पास तुम्हारे खुद को साबित करके दिखलाओ।

- श्याम जी प्रजापति






  हांँ हमें बेपनाह मोहब्बत  भी है उनसे,
 और कई बार शिकवे गिले भी रहते हैं।

  हांँ उनकी  आवाज बसी रहती है रोम रोम में मेरे,
 बस बातों पर उनके ज्यादा ध्यान नहीं रहता है।

  हाँ कभी-कभी  झूठ बोलना पड़ जाता है  उनसे,
 मगर यह बात उनको भी पता रहती है  अक्सर।

 हांँ कभी-कभी याद में उनके बरस पड़ते हैं  आंसू,
 मगर यही  पल एहसास दिलाता है मोहब्बत का  उनके।

 हांँ  मुलाकात नहीं होती है उनसे औरों की तरह,
 मगर जब होती है मुलाकात तो हर एक पल को  समेट लेते हैं।
                                     - श्याम जी प्रजापति