इस दुनिया की सच्चाई को बदल रहा इंसान हैं,
मदद ना करना तुम किसी का अब मिल रहा यही संस्कार है।
कागज कलम दवात नाम के ही अब सामान है,
चंद रुपयों के खातिर यहां बिकता जिनका ईमान है।
प्रेम सद्भावना अब रही ना इनमें,
हीन भावना और मतलब से सजा यहां बाजार है।
खुद में कभी ना बदलाव है लाता मगर बदलना चाहता है समाज को,
किस घमंड में चूर है दुनिया 1 दिन मरना है इंसान को,
कागज के टुकड़ों को बना लिया है देवता बेंच रहा है खुद के ईमान को।
समझ जाओ ऐ दुनिया वालों दया सब के प्रति दिखलाओ,
बचा है मौका पास तुम्हारे खुद को साबित करके दिखलाओ।
- श्याम जी प्रजापति