"इंसानियत ही न बची किसी मे ,
हर एक इंसान चालक बना बैठा है ।
जख्म तो दिखते हैं दुसरो के, उसको,
मगर फिर भी अनजान बना बैठा है।।
कुछ किताबें पढ़ कर नसीहते दिया करते हैं अक्सर,
सिर्फ वही इंसान इस समाज मे बेरोजगार बना बैठा है।
लोग अपनी असफलताओं का जिम्मेदार बताते हैं दूसरों को अक्सर,
आज वही इंसान अंदर से कमजोर बना बैठा है ।।
छुपा लेता है अपनी गलतियों को अक्सर,
जाने कितने इल्जाम अपने दिल में लिए बैठा है ।
मोहब्बत का इजहार न कर पाया किसी से वो,
जाने कितनी जिमेदारीयों का बोझ दिल में लिए बैठा है ।।
इंसानियत ही न बची किसी मे ,
हर एक इंसान चालक बना बैठा है ।।"